फिल्में जो हमें रानी लक्ष्मी बाई की याद दिला दे

रानी लक्ष्मी बाई एक सोच है, जो हर महिला को प्रेरित करती हैं

 
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रानी लक्ष्मी बाई यानि मणिकर्णिका का जन्म वाराणसी में 19 नवम्बर 1828 को हुआ था। रानी लक्ष्मीबाई उदाहरण है एक ऐसी औरत का, जिन्होंने अपने हक की लड़ाई लड़ी। महज़ 30 साल की उम्र में, 160 साल पहले 18 जून 1858 को रणभूमि में लड़ते-लड़ते उन्होनें अपनी जान गंवा दी। रानी लक्ष्मी बाई उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जो मुसीबतों के आगे, समाज की संकुचित मानसिकता के आगे अपने घुटने टेक देती हैं। हिंदी फिल्मों की बात करें तो हिंदी फिल्मों में रानी लक्ष्मी बाई पर या उनके किरदार से प्रेरित होकर कई फिल्में बनाई गई है। लेकिन रानी लक्ष्मी बाई की लड़ाई सिर्फ आज़ादी के लिए ही नहीं थी, उनकी लड़ाई पुरुष प्रधान समाज के खिलाफ भी थी। हाल फिलहाल में रिलीज़ हुई बॉलीवुड की यह पांच फिल्में ऐसी है, जहां महिलाओं ने यह साबित किया है कि वह अपनी लड़ाई खुद लड़ सकती हैं। उनकी लड़ाई और उनकी सोच आपको लानी लक्ष्मी बाई की याद दिला देगी।

क्वीन

फिल्म खुद की अपनी पहचान बनाने की सीख देती हैं

कंगना रनौत की साल 2013 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘’क्वीन’’कहानी है एक ऐसी लड़की की, जो अकेले ही हनीमून पर निकल पड़ती है। दिल्ली की एक ट्रेडनिशनल परिवार में पली-बढ़ी इस लड़की से शादी करने के लिए उसका मंगेतर सिर्फ इसलिए मना कर देता है क्योंकि उसे लगता है कि वह उसके हाई स्टैंडर्ड में फिट नहीं बैठेगी। विकास बहल निर्देशित यह फिल्म लोगों को काफी पसंद आई थी। इस फिल्म में कंगना ने रानी नाम की लड़की का किरदार निभाया था। फिल्म में रानी ने ये साबित कर दिया था कि खुश रहने के लिए ज़रूरी नहीं आपके साथ आपका कोई मेल पार्टनर हो। यहां रानी की लड़ाई खुद की पहचान ढूंढने की लड़ाई थी।

कहानी

अपनी लड़ाई लड़ने के लिए महिला अकेले ही काफी है

साल 2012 में आई फिल्म ‘कहानी’ विद्या बालन की उन फिल्मों में से एक है, जिसे काफी सराहा गया। सुजॉय घोष निर्देशित इस फिल्म की कहानी एक प्रेग्नेंट महिला की कहानी है, जो अपने खोए हुए पति की तलाश में लंदन से कोलकाता आ जाती है। वह उसे कैसे खोज निकालती है और उसका बदला लेती है, इसी पर इस फिल्म की कहानी है। सुजोय घोष निर्देशित इस फिल्म में विद्या का किरदार एक ऐसी औरत का है, जो अपने प्यार के लिए कुछ भी कर गुज़रती हैं, जो कमज़ोर नहीं हैं, जो इस पुरुष प्रधान समाज में अपने हक के लिए लड़ती हैं।

पिंक

महिलाओ के खिलाफ समाज का दोहरा नज़रिया आपको सोचने के लिए मजबूर कर देगा

साल 2016 में आई इस फिल्म की कहानी की जितनी तारीफ की जाए कम है। समाज में महिलाओं के प्रति दोहरे दृष्टिकोण पर यह फिल्म बहुत ही अच्छा प्रहार करती है। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन और तापसी पन्नू ने मुख्य भूमिका निभाई थी। इस फिल्म की बॉक्स ऑफ़िस सफलता से यह साबित हो गया कि हमारे समाज में औरतों से जुड़े कई विषय और नज़रिए है, जिसे बदलने की ज़रुरत हैं। देश की आज़ादी के बावजूद, महिलाओं की आज़ादी को लेकर आज भी संघर्ष हो रहा है।

मर्दानी

समाज में चल रही गलत चीज़ो के लिए भी आवाज़ उठाए

साल 2014 में आई इस फिल्म का टाईटल भी दरअसल झांसी की रानी पर लिखी कविता ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी’ से ही लिया गया था। रानी मुखर्जी की इस कमबैक फिल्म का निर्देशन प्रदीप सरकार ने किया था। इस फिल्म में रानी मुखर्जी शिवानी शिवाजी राव नाम की एक पुलिस ऑफ़िसर का किरदार निभाती नज़र आई थी। यह फिल्म ह्यूमन ट्रैफिकिंग पर बनाई गई थी। इस फिल्म में पुलिस ऑफ़िसर बनी रानी मुखर्जी जिस तरह से समाज के लोगों से, बुराईयों से लड़ती है, वह सभी लड़कियों के लिए प्रेरणा है। आज भी हमारे समाज में महिला को चार दीवारी में बंद रखा जाता है, ऐसे में शिवानी शिवाजी राव का यह किरदार पुरुष प्रधान समाज के लिए तमाचा है।

दंगल

कोई भी काम औरत और मर्द के लिए अलग अलग नहीं हैं

साल 2016 में नितेश तिवारी निर्देशित फिल्म ‘दंगल’ की दोनों लड़कियां गीता और बबीता उन सभी लड़कियों के लिए उदाहरण है, जो कई चीजें सिर्फ इसलिए करने से रुक जाती हैं क्योंकि उन चीजों को मर्दों से जोड़कर देखा जाता है। इन दोनों लड़कियों की कहानी असली ज़िंदगी पर आधारित थी। फिल्म में आमिर खान नें इन लड़कियों के पिता का किरदार निभाया था। आप जो ठान ले उसे कर गुज़रना चाहिए, समाज में कोई भी काम लड़के या लड़की के लिए अलग अलग नहीं है, आपकी सोच आपको आगे तक ले जा सकती है, यहीं प्रेरणा इस फिल्म से मिलती है।

हिंदी सिनेमा की यह कुछ फिल्में हमें यही सीख देती है कि रानी लक्ष्मी बाई की सच्चाई के लिए, अपने हक के लिए, अपनी स्वतंत्रता के लिए लड़ने की जो सोच थी, उसे हर महिला को कायम रखना चाहिए। लड़ाई सिर्फ तलवार उठाकर नहीं, अपनी सोच से भी लड़ी जा सकती है। उस दौरान तलवार उठाना समय की मांग थी, आज आवाज़ उठाकर भी अपनी लड़ाई को लड़ा जा सकता है। ध्यान रहे कि आवाज़ की धार, किसी तलवार की धार से कम तेज़ नहीं।