हिंदी दिवस विशेष: क्यों स्टैंडअप कॉमेडियन चुन रहे हैं हिंदी को?

स्टैंडअप कॉमेडी से आज भी जुड़े हुए हैं हिंदी के तार

 

आज 10 जनवरी विश्व हिंदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। 10 जनवरी 1975 को पहली बार हिंदी के प्रचार के लिए नागपुर में विश्व हिंदी सम्मलेन का आयोजन किया गया था, जिसमें 30 देशों के 122 प्रतिनिधि शामिल हुए थे। यही वजह है कि इसे विश्व हिंदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने साल 2006 में सबसे पहले विश्व हिंदी दिवस मनाने की पहल की थी, जिसके बाद इसे हर साल मनाया जाता है।

भारत में जहां लोग आपस में इंग्लिश में बात करना पसंद करते हैं, वहीं हिंदी भाषी कहीं खोते चले जा रहे हैं। क्यों हम हिंदी में बात करने से शर्माते हैं और टूटी-फूटी इंग्लिश बोलना भी शान की बात समझते हैं? लेकिन आज हम आपके सामने लेकर आ रहे हैं एक ऐसी बात, जिसकी ओर शायद आपने ध्यान नहीं दिया होगा। स्टैंडअप कॉमेडी, जिससे आज कल युवा वर्ग तेज़ी से जुड़ रहा है, क्या आप इससे राबता रखते हैं? यदि आपका जवाब हां में है, तो एक सवाल मेरा आपके लिए और भी है। क्या आप हिंदी कॉमेडी सुनना पसंद करते है? आप में से कई लोगों का जवाब हां हो सकता है।

अपनी जड़ों से जुड़े हुए रोज़मर्रा के कामों पर जब कोई आपको हंसाएं, तो किसे हंसी नहीं आएगी। आज हिंदी दिवस पर हम बात करेंगे एक ऐसे ही स्टैंडअप कॉमेडियन से, जो आज भी अपनी मातृभाषा से जुड़े रह कर आपको हंसी से लोट-पोट करने की ताकत रखते हैं। तो देर किस बात की, आपको लेकर चलते हैं प्रतिभाशाली स्टैंडअप कॉमेडियन प्रत्युष चौबे के पास।

हिंदी से जुड़ते हैं लोग

हिंदी दिवस पर भी वे लोगों ने कहना चाहते हैं कि अपनी भाषा से जुड़े रहें।

प्रत्युष का मानना है कि लोग हिंदी से आसानी से जुड़ जाते हैं। उनकी मातृभाषा या कहें फर्स्ट लैंग्वेज हिंदी है, जिसकी वजह से वह हिंदी में कॉमेडी आसानी से कर पाते हैं। वहीं प्रत्युष किसी भी क्षेत्र की लोकल लैंग्वेज को बेहद सपोर्ट करते हैं। उनका मानना है कि लोग अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं, इसलिए वे उस भाषा को समझ कर जुड़ पाते हैं, जो उनकी अपनी है। इसलिए हिंदी दिवस पर भी वे लोगों ने कहना चाहते हैं कि अपनी भाषा से जुड़े रहें।

अपनी भाषा से जुड़ें

भारत में 22 अलग-अलग भाषाएं प्रचलित हैं, जिनमें हिंदी को राष्ट्रीय भाषा का ताज पहनाया गया है। प्रत्युष मानते हैं कि लोगों को किसी बाहरी भाषा के दबाव में आकर खुद को नहीं बदलना चाहिए। अपनी बोली से जुड़े रहना आपके लिए फ़ायदेमंद होगा। प्रत्युष यूपी से ताल्लुक रखते हैं और वे मानते हैं कि हिंदी से वे लोगों बेहतर रूप से जुड़ पाते हैं। जब बात आती है स्टैंडअप कॉमेडी की, तो उनका मानना है कि कहानी या कॉन्सेप्ट दिलचस्प होना चाहिए, जिससे लोग उस कॉमेडी का लुत्फ़ उठा पाएं।

कॉमेडी के क्षेत्र में हिंदी का बोलबाला

प्रत्युष की माने तो कॉमेडी के क्षेत्र में हिंदी से लोग आसानी से जुड़ जाते हैं। इस क्षेत्र में हिंदी को लोग प्यार से अपनाते हैं। जब भी हिंदी कॉमेडी की बात आती है, तो हमेशा उसके लिए तैयार रहते हैं। कॉमेडी के क्षेत्र में उन्हें हिंदी भाषी होने की वजह से कभी भी दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ा।

लोकल लैंग्वेज के लिए है इज़्ज़त

हर व्यक्ति अपने क्षेत्र की भाषा का दामन पकड़कर बड़ा होता है और इसलिए प्रत्युष कहते हैं कि लोकल लैंग्वेज को हमेशा सम्मान मिलना चाहिए। अपने एक मज़ाकिया संयोग के बारे में बात करते हुए प्रत्युष ने बताया, “एक समय ऐसा आया था कि मैं अपने बॉस को हिंदी में मेल कर दिया करता था। आखिर एक दिन उन्होंने आकर मुझसे पूछा कि ऐसा क्यों कर रहे हो? जिसके जवाब में मैंने कहा, ‘आप आसानी से समझ पाए कि मैं क्या बोलना चाहता हूं और यह सबसे ज़्यादा ज़रूरी है!” इसका तात्पर्य ये हुआ कि लोगों को आपकी बात आसानी से समझनी चाहिए, जो आप अपनी मातृभाषा में बेहतर कर सकते हैं।

प्रत्युष की कहानी- उन्ही की ज़ुबानी

‘मैं थोड़ा स्लो हूं। मुझसे जल्दी-जल्दी काम नहीं हो पाता। मैंने सायकल भी 11वीं कक्षा में आकर सीखी थी। मैं किसी स्टैंडअप को लिखने में भी बेहद समय लगता हूं। और क्या कहूं?” शायद यही है प्रत्युष के बेहतरीन स्टैंडअप का राज़।

आज हिंदी दिवस पर क्यों ना आप भी इनकी कॉमेडी का लुत्फ़ उठाकर खिलखिलाएं!