कच्छ में सिर्फ सफेद रेगिस्तान ही नहीं, ‘मोर’ भी है

कुछ दिन तो गुज़ारो रापर, सुमरासर और निलपर में

 
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गुजरात राज्य के कच्छ ज़िले में सैर सपाटा करने के लिए दिसम्बर से फरवरी के बीच देश-विदेश से कई पर्यटक आते हैं। कच्छ जिला पुरातन स्थापत्य ,लोकसंगीत, हस्तकला, भव्य महल, सफ़ेद रेगिस्तान के अलावा वाइल्ड लाइफ के लिए भी मशहूर है। हम आपको आज कच्छ के वाइल्ड लाइफ एरिया के बारे मे बताएंगे, जिसके बारे मे अधिकतर टूरिस्ट को जानकारी नहीं है। ये बात तो हम सब जानते है कि गुजरात राज्य ”एशियाटिक लायन” यानी शेर के लिए मशहूर है,लेकिन हम आपसे कहे कि कच्छ हमारे राष्ट्रीय पक्षी ‘मोर’ के लिए भी जाना जाता है। आपको शायद विश्वास ना हो, लेकिन

एक वक़्त था जब कच्छ के सभी गांव में ,हर घर आंगन में सुबह सुबह मोर दाना चुगने आते थे। आप भी देखिए कैसे

जूनागढ़ डिस्ट्रिक्ट के बाद कच्छ डिस्ट्रिक्ट मे सबसे अधिक मोर की संख्या हे। हम आपको बताएंगें कि आपको अगर कच्छ के मोर देखने है तो आप कहां जा सकते हैं।

टाइटल : रवेचि अभ्यारण्य के मोर

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प्राचीन रवेचि मंदिर को मोरों का दूसरा घर माना जाता है।

रवेचि मंदिर के पास स्थित मोर अभयारण बहुत खास हे। भुज से कार या बस से आप रापर

रवेची गांंव जा सकते है। भुज से रापर तहसील 127 किलोमीटर दूर है। आप भुज तक हवाई यात्रा या ट्रेन में यात्रा कर पहुंच सकते हैं। रापर का रवेचि मंदिर मांं शक्ति का प्राचीन मंदिर है, जो चारों ओर से जंगलों से घिरा है। यहा लगभग 3 हज़ार मोर है। रापर फॉरेस्ट डिपार्टमेन्ट के फॉरेस्ट ओफिसर वासुदेव. इंदुलाल जोशी के मुताबिक, “यहां सुबह 6 बजे मंदिर के आसपास के खेत मे मोर दाना चुगने के लिए आते हैं। शाम को 5 बजे तक आप मोर को देख सकते हो। उसके बाद मोर वापिस जंगल मे चले जाते हैं।”

रवेचि जंगल में मोर का अभयारण अगर किसी भी पर्यटक को देखना हो तो इसे फॉरेस्ट डिपार्टमेन्ट की पर्मिशन लेनी पड़ेगी। पर्मिशन मिलने के बाद फॉरेस्ट डिपार्टमेन्ट के एक अधिकारी को साथ में भेजा जाता है। खास बात है कि यहा रुकने की भी व्यवस्था की गई है। यहां बिना बाउंड्री के मोर को खुले खेतों में या मकान की छत पर देखने का नज़ारा बहुत प्यारा होता है।

निलपर ओर बेला फॉरेस्ट की सैर करना ना भूले

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यहां मोर के साथ साथ और भी जानवर देखने को मिलेंगे

अगर आपको रवेचि फॉरेस्ट के मोर देखने का मौका ना मिला हो तो आप रापर के पास निलपर फॉरेस्ट मे जाकर मोर को देख सकते है। यहा कम से कम 100 से ज़्यादा मोर आपको देखने मिल सकते हैं। यहा आप बस या टैक्सी से भी पहुंच सकते हैं। निलपर ओर बेला फॉरेस्ट दोनों ही सुबह 9 से शाम 4.30 तक खुला रहता है। इस फॉरेस्ट में घूमने के लिए भी आपको भुज के फॉरेस्ट हेड क्वाटर से अनुमति लेनी होगी। इस फॉरेस्ट की खास बात यह है कि यहां मोर के अलावा लोमड़ी, चिंकारा, घुडखर ओर नीलगाय भी देखने को मिलेगी। अगर आप यहां जाने का प्लान बना रहे हैं तो ध्यान रहे कि यहां रात के वक्त अक्सर तेंदुआ आता है, इसलिए शाम के वक़्त यहां जंगल मे घूमने की मंज़ूरी नहीं हैं।

सुमरासर के मोर

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मोर की कला देखते हुए

भुज स्टेशन से 28 किलोमीटर की दूरी पर है सुमरासर गांव । सुमरासर में भी मोर बड़ी संख्या में देखे जा सकते हैं। हाल ही में राज्य सरकार के आंकड़ों के हिसाब से पूरे कच्छ ज़िले में महज 10,379 मोर बचे हैं। सुमरासर गांव का दूसरा नाम ”जतवाली” भी है। सुमरासर फॉरेस्ट से भुज , आदिपुर , गांधीधाम ओर मांडवी ये चार शहर नज़दीक हे। सुमरासर फॉरेस्ट मे रहने और खाने की व्यवस्था नहीं है। जो पर्यटक यहां रुकना चाहते है, उन्हें भुज शहर में ही रहने की व्यवस्था करनी होगी। यहां 200 से अधिक मोर पाए जाते हे। सुमरासर से 3 किलोमीटर की दूरी पर नायक नायकवाडी फॉरेस्ट है, वहां पर भी आप कई मोर देखे सकते हैं। इस फॉरेस्ट में आपको मोर के साथ साथ नीलगाय और लोमड़ी भी देखने को मिलेंगे।

खास बात है कि मोरों की संख्या कम होती जा रही हैं। जिसके चलते कच्छ में ” मोर बचावो अभियान” शुरु किया गया था, जिससे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके हमारे राष्ट्रीय पक्षी मोर को बचाया जा सके। यहां फॉरेस्ट डिपार्टमेंट और निजी संस्थान की तरफ से भी मोरों के लिए चबूतरे बनाये गये हैं।

इन फॉरेस्ट के अलावा कच्छ के गांगोदर और साय गांव मे बहुत सारे मोर आज भी देखने को मिल सकते हैं। अगर आप फरवरी महीने तक चल रहे कच्छ रण उत्सव में जाने का प्लान बना रहे हैं ,तो सुमरासर- गांगोदर-साय गांव के मोर को देखने का मौका ना छोड़े।

तो देर किस बात की बिना बारिश के भी नाचते झूमते मोर देखने है तो कच्छ से अच्छा कुछ भी नहीं।